Monday, July 16, 2007

माओवादी हिंसा

बिहार के विभिन्न हिस्सों से माओवादी हिंसा की खबरें लगातार आ रही हैं। हिंसा के अचानक उभार से बिहार में विकास की आस लगाये आम जन उदास और हतप्रभ हैं। इसके पहले उग्र राजनीति के कुछ खास इलाके थे जैसे गया, जहानाबाद और भोजपुर। इस बार कहीं ज्यादा फैले हुए क्षेत्र से हिंसा की सूचना है।राजसत्‍ता में आने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने माओवादियों के लिए एक संदेश दिया था कि उन्हें उनके विचार फैलाने की राजनीति से एतराज नहीं है, लेकिन हिंसा को वह कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। लगता है नीतीश कुमार को माओवादियों ने समझने की कोशिश नहीं की। जाहिर है कोई भी सरकार हिंसा को चुपचाप नहीं देख सकती। लेकिन जब बन्दूकें टकरायेंगी तो मानवाधिकारों का हनन अवश्यम्भावी होगा। हिंसा-प्रतिहिंसा के शोर में विकास का बन रहा वातावरण भी खत्म हो सकता है।हम किसी तरह की हिंसा का समर्थन नहीं करते-चाहे वह सरकारी हिंसा हो अथवा किसी राजनीतिक संगठन की। हिंसा से कोई बडा मकसद हासिल हो सकता है, इसमें हमें संदेह है। तेलंगना से लेकर अब तक के इतिहास से हमने यही सबक लिया है। लेकिन जो सरकार बढ़-चढ़ कर १८५७ के सश विद्रोहों की १५० वीं जयन्ती पर जलसा आयोजित कर रही हो उसे इस तरह की हिंसा के विरोध का नैतिक हक नहीं है। माओवादी कह सकते हैं, और कहते ही हैं कि यह उनका मुक्तियुद्ध है।इसके पहले भी हमने अपने अग्रलेख में माओवादी हिंसा को समझने की कोशिश की थी। हम एक बार फिर सरकार से कहना चाहेंगे कि वह उग्रवाद उभरने के वास्तविक कारणों तक जाये और उनका निराकरण करे, बजाय पुलिसिया दमन के। दमन पर खर्च होने वाला धन गरीबी उन्मूलन पर खर्च होना चाहिए। इसके साथ ही माओवादियों से भी हम कहेंगे कि वे हिंसा से बाज आयें। पुलिस थानों पर जिन सिपाहियों की वे जान ले रहे हैं वे भी आम जन हैं और अपने परिवार का पेट पालने के लिए चाकरी कर रहे हैं। उन्हें बन्दूक रखने का कोई शौक नहीं है। वे यदि सामंतों के औजार बनते हैं तो इसके लिए मौजूदा राजनीति जिम्मेदार है। वे तो स्वयम् अपने संघ के माध्यम से इन आचरणों के विरुद्ध बगावत के स्वर उठाते रहे हैं। उन्हें राजसत्‍ता का प्रतीक मानकर उनपर हमला करना ज्यादती है।बुरी तरह पिछड़ चुके बिहार में प्रगति और विकास का वातावरण बहाल करनाबहुत जरूरी है। लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि गरीबों को विश्वास में लिया जाय। पिछले पंद्रह वर्षों के लालू राज में बिहार का विकास तो ठप था, लेकिन पिछडे दलितों में झूठा ही सही, अहसास था कि लालू उनके हैं और उनके माध्यम से उनका राज चल रहा है। इस कारण अतिवादी ताकतें गरीब जनता को हिंसा के लिए गोलबंद करने में विफल रहीं। नीतीश सरकार बनते ही एक अफवाह फैली कि सामन्तों का राज फिर बहाल हो गया है। दुर्भाग्य से यह बात निचले स्तरों (ग्रास रूट) तक चली गयी है। नीतीश सरकार ने पंचायती राज से लेकर राशन-किरासन और इंदिरा आवास योजना तक में पारदर्शिता लाकर इन योजनाओं को वास्तविक रूप में गरीबों से जोडने की कोशिश की है। लेकिन जनता इज्जत के साथ रोटी चाहती है। उसे लगता है लालू राज में उसकी रोटी पर भले ही आफत थी, उसकी इज्जत ठीक-ठाक थी। नीतीश सरकार को अपनी बहुप्रचारित सामंती छवि से मुक्ति पानी होगी। यदि इसमें वह विफल होती है तो हिंसा को रोक पाना मुश्किल होगा।

Monday, July 9, 2007